Friday, November 16, 2018

صف فوزي برهوم، المتحدث باسم حماس، العملية بأنها "هجوم إسرائيلي جبان

وسوت القذائف الإسرائيلية أربعة مبان متعددة الطوابق في غزة بالأرض، منها محطة تلفزيون وثلاثة منازل. وقال شهود إن صواريخ تحذيرية تحمل رؤوسا حربية صغيرة أطلقت أولا فأصابت دون أن تدمر الجدران الخارجية لسبعة مبان.
ونقلت وكالة رويترز للأنباء عن أحد السكان قوله إن صيحات الجيران أيقظته من نومه.
وأضاف أن "صاروخا من طائرة إف-16 دمر المبنى بالكامل" وأنه ليس لديه أدنى فكرة عن سبب قصف المبنى.
وقال متحدث باسم الجيش الإسرائيلي إن جميع المباني التي قصفها الجيش "مملوكة لحماس أو تديرها الحركة أو تستخدمها".
وعقد رئيس الوزراء الإسرائيلي بنيامين نتنياهو اجتماعا لمجلس الوزراء الأمني المصغر الثلاثاء لبحث الخطوات التالية، وقال الجيش إنه أرسل تعزيزات من المشاة والمدرعات إلى الحدود مع غزة.
وقال مسؤول فلسطيني "مصر والأمم المتحدة ضاعفتا من جهودهما مع كل من إسرائيل والفصائل الفلسطينية خلال الليل وصباح اليوم من أجل استعادة الهدوء ومنع مزيد من التصعيد".
وأضاف "الفصائل الفلسطينية قالت إن على إسرائيل أن توقف القصف أولا".
وحثت مصر إسرائيل على وقف التصعيد. أما الولايات المتحدة، التي تعثرت وساطتها للسلام منذ حرب 2014 التي استمرت سبعة أسابيع، فنددت بحماس.
لماذا لم تكشف إسرائيل تفاصيل عملية الأحد؟
ولم تكشف إسرائيل تفاصيل مهمة العملية نظرا لسريتها. لكن الجيش الإسرائيلي قال إن العملية "لم تكن تعتزم قتل أو خطف إرهابيين، لكنها كانت تهدف إلى تعزيز الأمن الإسرائيلي".
ويقول مراسل بي بي سي في القدس إن هدف العملية على ما يحتمل - بحسب ما قاله جنرال إسرائيلي سابق - كان جمع معلومات استخبارية، ولكنها فشلت.
ويضيف أن كشف عملية تنفذها قوات خاصة داخل غزة كهذه أمر نادر.
وندد فوزي برهوم، المتحدث باسم حماس، بعملية الأحد واصقا إياها بـ"هجوم إسرائيلي جبان".
وقد خاضت إسرائيل الحرب ضد حماس ثلاث مرات، وأصبح إطلاق الصواريخ من غزة، والغارات الإسرائيلية على أهداف لحماس أمرا يتكرر حدوثه.
قال الجيش الإسرائيلي إنه نفذ غارات جوية على قطاع غزة الاثنين في أعقاب إطلاق صواريخ من القطاع على الأراضي الإسرائيلية.
وبحسب الجيش، فإن حافلة خالية من الركاب أصيبت بصاروخ أطلق من القطاع.
وأطلقت عشرات الصواريخ دفعة واحدة من غزة تجاه إسرائيل، ودوت انفجارات كبيرة في مناطق مختلفة.
وجاءت هذه التطورات عقب عملية عسكرية إسرائيلية أسفرت عن مقتل ضابط إسرائيلي، وسبعة فلسطينيين، من بينهم قائد في كتائب عز الدين القسام، الجناح العسكري لحركة حماس.
وقتل 3 فلسطينيين على الأقل. وفي الجانب الإسرائيلي، عُثر على جثة تحت حطام مبنى أصابه صاروخ، بينما قال مسعفون إن 10 أشخاص أصيبوا.
حسب المصادر الفلسطينية، فإن وحدة إسرائيلية كانت دخلت إلى مسافة 3 كيلومترات في عمق قطاع غزة، عندما أوقفها مسؤولون أمنيون تابعون لحركة حماس التي تسيطر على القطاع.
وقالت كتائب عز الدين القسام، الجناح العسكري لحركة حماس، إن الإسرائيليين أطلقوا النار على القيادي الفلسطيني، نور بركة، فأردوه قتيلا.
وقال شهود إن معركة اندلعت بعدها تدخلت فيها الدبابات والطائرات الإسرائيلية.
وينتمي القتلى الستة إلى حركة حماس أما السابع فهو من لجنة المقاومة الشعبية.
وقال الجيش الإسرائيلي إن واحدا من أعضاء الوحدة الخاصة قتل وأصيب آخر بجروح خفيفة.
وقطع رئيس الوزراء الإسرائيلي، بنيامين نتنياهو، بعد الحادث زيارته إلى باريس لحضور احتفالات الذكرى المئوية لنهاية الحرب لم تفصح إسرائيل عن تفاصيل العملية السرية التي نفذتها.
وقال الجيش الإسرائيلي إن العملية "لم تكن تهدف إلى قتل أو اختطاف الإرهابيين"، ولكن إلى "تعزيز أمن إسرائيل".
ويقول مراسل بي بي سي في القدس، توم بيتمان، إنه وفقا لجنرال إسرائيلي سابق، من المرجح أن يكون ما حدث هو عملية استخباراتية خرجت عن السيطرة.
ومن النادر أن تنكشف عملية إسرائيلية مثل هذه في غزة.
العالمية الأولى، وعاد إلى إسرائيل، حسب مكتبه

Friday, October 5, 2018

महात्मा गांधी को क्यों नहीं मिला शांति का नोबेल पुरस्कार?

विभिन्न क्षेत्रों में उम्दा काम करने वालों को नोबेल पुरस्कार देने की घोषणाओं का सिलसिला जारी है और इंतज़ार है शांति के नोबेल पुरस्कार का.
1901 में शुरुआत के बाद से शांति के क्षेत्र में 98 नोबेल पुरस्कार दिए जा चुके हैं. हर साल 10 दिसंबर को ये पुरस्कार दिए जाते हैं.
पुरस्कार देने की शुरुआत रेड क्रॉस के संस्थापक जीन हेनरी ड्यूनेन्ट से की गई. 19 बार इन पुरस्कारों की घोषणा नहीं की गई, जबकि कुल मिलाकर 27 बार इन पुरस्कारों के लिए किसी व्यक्ति को नहीं बल्कि संस्था को देना मुनासिब समझा गया.
हर साल इसकी घोषणा के पहले या बाद में भारत में यह बहस आम होती है कि महात्मा गांधी को यह पुरस्कार क्यों नहीं दिया गया जो आधुनिक युग के शांति के सबसे बड़े दूत माने जाते हैं.
नोबेल कमेटी ने इस बात पर कभी टिप्पणी नहीं की इसलिए आम तौर पर लोगों का यह ख़याल रहा है कि नोबेल कमेटी गांधी को इस पुरस्कार से सम्मानित कर अंग्रेज़ी साम्राज्य की नाराज़गी मोल लेना नहीं चाहती थी.
लेकिन हाल ही में कुछ दस्तावेज़ों से यह उजागर हुआ है कि नोबेल कमेटी पर इस तरह का कोई दबाव ब्रितानी सरकार की तरफ़ से नहीं था.हात्मा गांधी को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चार बार नामांकित किया गया था.
इन्हें लगातार 1937, 1938 और 1939 में नामांकित किया गया था. इसके बाद 1947 में भी उनका नामांकन हुआ.
फिर आख़िरी बार इन्हें 1948 में उन्हें नामांकित किया गया लेकिन महज़ चार दिनों के बाद उनकी हत्या कर दी गई.
पहली बार नॉर्वे के एक सांसद ने उनका नाम सुझाया था लेकिन पुरस्कार देते समय उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया गया.
उस समय के उपलब्ध दस्तावेज़ों से पता चलता है कि नोबेल कमेटी के एक सलाहकार जैकब वारमुलर ने इस बारे में अपनी टिप्पणी लिखी है.
उन्होंने लिखा है कि वह अहिंसा की अपनी नीति पर हमेशा क़ायम नहीं रहे और उन्हें इन बातों की कभी परवाह नहीं रही कि अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ उनका अहिंसक प्रदर्शन कभी भी हिंसक रूप ले सकता है. (इसके बाद के हालात ने यह साबित किया कि इस तरह का शक बेबुनियाद नहीं था).
जैकब वारमुलर ने लिखा है कि गांधी की राष्ट्रीयता भारतीय संदर्भों तक सीमित रही यहाँ तक कि दक्षिण अफ़्रीका में उनका आंदोलन भी भारतीय लोगों के हितों तक सीमित रहा.
उन्होंने अश्वेतों के लिए कुछ नहीं किया जो भारतीयों से भी बदतर ज़िंदगी गुज़ार रहे थे.
अब इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जब मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला जैसे लोगों को शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया तो उन्होंने स्वीकार किया कि वे गांधी के रुहानी शागिर्द हैं और उन्होंने अहिंसक संघर्ष का सबक़ गांधी के कारनामों से सीखा है.
1947 में शांति पुरस्कारों के लिए सिर्फ़ छह लोगों का नामांकन किया गया. उनमें गांधी का नाम भी शामिल था
लेकिन अख़बारों में छप चुके भारत विभाजन के बाद गांधी के कुछ विवादास्पद बयानों की वजह वो शांति पुरस्कार से वंचित रह गये. तब यह पुरस्कार मानवाधिकार आंदोलन क्वेकर को दे दिया गया था.ख़ुद क्वेकर ने इस पुरस्कार के लिए गांधी का नाम प्रस्तावित किया.
नामांकन की आख़िरी तारीख़ के महज़ दो दिन पूर्व गांधी की हत्या हो गई. इस समय तक नोबेल कमेटी को गांधी के पक्ष में पांच संस्तुतियां मिल चुकी थीं.
लेकिन तब समस्या यह थी कि उस समय तक मरणोपरांत किसी को नोबेल पुरस्कार नहीं दिया जाता था.
हालांकि इस समय इस तरह की क़ानूनी गुंजाइश थी कि विशेष हालात में यह पुरस्कार मरणोपरांत भी दिया जा सकता है.
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लेकिन कमेटी के समक्ष तब यह समस्या थी कि पुरस्कार की रक़म किसे अदा की जाए क्योंकि गांधी का कोई संगठन या ट्रस्ट नहीं था. उनकी कोई जायदाद भी नहीं थी और न ही इस संबंध में उन्होंने कोई वसीयत ही छोड़ी थी.
हालांकि यह मामला भी कोई क़ानूनी पेचीदगियों से भरा नहीं था जिसका कोई हल नहीं होता लेकिन कमेटी ने किसी भी ऐसे झंझट में पड़ना मुनासिब नहीं समझा.
तब हालत यह हो गई कि 1948 में नोबेल पुरस्कार किसी को भी नहीं दिया गया.
कमेटी में अपनी प्रतिक्रिया में जो कुछ लिखा है उससे यह आभास होता है कि अगर गांधी की अचानक मौत नहीं होती तो उस वर्ष का नोबेल पुरस्कार उन्हें ही मिलता.
कमेटी ने कहा था कि किसी भी ज़िंदा उम्मीदवार को वह इस लायक़ नहीं समझती इसलिए इस साल का नोबेल इनाम किसी को भी नहीं दिया जाएगा.
इस बयान में ज़िंदा शब्द ध्यान देने योग्य है. इससे इशारा मिलता है कि मरणोपरांत अगर किसी को यह पुरस्कार दिया जाता तो गांधी के अलावा वह व्यक्ति और कौन हो सकता है.
आज यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि क्या गांधी जैसी महान शख़्सियत नोबेल पुरस्कार की मोहताज थी.
इस सवाल का सिर्फ़ एक ही जवाब है कि गांधी की इज़्ज़त और महानता नोबेल पुरस्कार से भी बड़ी थी.
अगर नोबेल कमेटी उन्हें यह पुरस्कार देती तो इससे उसी की शान बढ़ जाती. लेकिन नोबेल कमेटी ने यह अवसर गंवा दिया.

Tuesday, September 25, 2018

कोर्ट में दिये फैक्ट पता लगाने को बनी कमेटी

पंजाब विश्वविद्यालय सिंडिकेट ने रविवार को पूर्व कुलपति प्रो. अरुण कुमार ग्रोवर पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाने वाली एक महिला सीनेटर के पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर किये जाने के मामले को लेकर पीयू की ओर से रजिस्ट्रार द्वारा कोर्ट को दिये गये जवाब में क्या फैक्ट दिये गये, इसका पता लगाने के लिए एक कमेटी बना दी है। अशोक गोयल व कुलपति के सचिव मुनीश्वर जोशी पर आधारित कमेटी यह भी पता करेगी कि क्या इसमें कोई लीगल राय ली गयी है या नहीं? कमेटी केस के सभी पहलुओं की जांच करके रिपोर्ट देगी।
वहीं, समाजशास्त्र विभाग की एक रिसर्च स्कॉलर के केस में सिंडिकेट ने अपना ही पहले का फैसला वापस ले लिया और छात्रा का पीएचडी का रजिस्ट्रेशन बहाल कर दिया और पूर्व कुलपति के खिलाफ रिसर्च स्कॉलर द्वरा दी गयी शिकायत को चांसलर को भेजने का फैसला लिया गया ताकि वे इस पर कोई समुचित फैसला ले सकें। इस रिसर्च स्कॉलर ने पीयू की एक महिला अधिकारी व प्रोफेसर के वकील बेटे पर आरोप लगाया था कि उसने उसका पीछा कर उससे अश्लील हरकत की और उसकी स्कूटी को टक्कर मार कर गिरा दिया जिससे उसे गंभीर चोटें आयी थी। मगर बाद में पीयू की जांच में उलटा रिसर्च स्कॉलर को ही दोषी ठहरा कर उसका पीएचडी का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया गया था। इसी तरह समाजशास्त्र की ही एक अन्य रिसर्च स्कॉलर के 24 जुलाई को कराये गये वाइवा को भी सिंडिकेट ने अप्रूव कर दिया। इस छात्रा का भी उपरोक्त मामालों की तरह का ही कोई केस था।
इसी तरह बैठक में हॉस्टल मैस व कैंटीनों में ठेकेदारी सिस्टम जारी रखने पर फैसला हुआ। सिंडिकेट ने अपने सभी दफ्तरों और सोसायटी के बीच हिंदी के प्रयोग को भी हरी झंडी दे दी। सिंडिकेट ने अंडरग्रेजुएट लेवल पर सेमेस्टर सिस्टम को समाप्त करने संबंधी मसले पर सिंडिकेट ने स्टैंडिंग कमेटी को भंग कर कुलपति को नई कमेटी बनाने के लिये अधिकृत कर दिया। कमेटी जो सिफिरिश करेगी उसे फिर सिंडिकेट में लाया जायेगा।
पुरुषों को भी चाइल्ड केयर लीव
महिला कर्मचारियों की तर्ज पर पुरुषों को भी चाइल्ड केयर लीव (सीसीएल) देने के मामले पर भी सिंडिकेट ने विचार किया और पंजाब सरकार के रूल फालो करने की बात कहते हुए इसे एडाप्ट कर लिया। मजे की बात यह है कि पंजाब में पुरुषों के लिये कोई सीसीएल नहीं है। यहां तक कि देश के किसी भी संस्थान में फिलहाल पुरुषों के लिये सीसीएल का कोई प्रावधान नहीं है।
उठाया अरविंदो कालेज का मसला भी
इंदरपाल सिंह सिद्धू शून्यकाल में अरविंदो कालेज लुधियाना के दो टीचर्स को सस्पेंड करने का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि तीन-चार दिन पहले ही दोनों को कालेज ने डिसमिस कर दिया जिस पर पीयू को भी लीगल राय लेकर उसे डिस-एफिलिएशन का नोटिस भेजना चाहिए। इसी तरह सीवीओ प्रो. सुवीरा गिल को कंस्ट्रक्शन परचेज के विषय में दी गयी रिपोर्ट को फिर से तैयार करने को कहा गया क्योंकि टेक्नीकल काम करने और फिजिकल वेरीफिकेशन करना सिंडिकेट के लिये संभव नहीं है। प्रो. प्रवीण गोयल के प्रस्ताव पर सिंडिकेट ने कहा कि बैठक के बाद मिनट्स की साफ्ट क़ॉपी हर सीनेटर को भेज दी जायेगी।प्राचीन समय में कालका रेलवे स्टेशन के प्लेट फार्म नं. 1 और 2 में लगे ब्रिटिश काल के हाइड्रोलिक वाटर बफर दोबारा उसी जगह स्थापित किए जाएंगे। रेलवे विभाग कबाड़ में पड़े बफर निकाल कर रिपेयर कर रहा है। गत 3 वर्ष पूर्व लगाये गए नये बम्पर बफर निकालने का काम रविवार को आरंभ हुआ। गत माह रेलवे बोर्ड चेयरमैन अश्वनी लोहानी ने कालका दौरे के दौरान पुराने बफर निकालने और प्राचीन विरासत को संरक्षित करने के लिए कालका स्टेशन को पुराने स्वरूप में में सुंदर बनाने के निर्देश दिये थे। इससे कालका रेलवे स्टेशन की वही पुरानी रौनक लौटने की उम्मीद है।
सन 1927 में इंगलैंड में निर्मित बफर कालका के अलावा देश में केवल कानपुर, कोलकाता रेलवे स्टेशनों पर ही लगे थे। शाम को ट्रेन आने के समय लोग इसे देखने के लिए इकट्ठा होते थे। क्योंकि रुकने के लिए जैसे ही ट्रेन इससे टकराती थी तो इसमें से पानी के ऊंचे-ऊंचे फव्वारे छूटते थे। चंडीगढ़-शिमला एनएच पर स्थित अमरावती कॉलोनी के सामने 2 वर्ष पूर्व मंजूर फ्लाई ओवर ब्रिज निर्माण का रास्ता खुल गया है। केन्द्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्रालय ने एनएचएआई प्रोजेक्ट डायरेक्टर को फ्लाई ओवर ब्रिज निर्माण के लिए शीघ्र ही नये टेंडर लगा नयी कंपनी को काम सौंपने के आदेश दिए हैं। रविवार को अमरावती रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन प्रधान शमशेर शर्मा ने बताया कि लगभग 24 करोड़ रुपये की लागत के ब्रिज निर्माण का टेंडर पहले जीरकपुर-परवाणू हिमालयन एक्सप्रेस निर्माण कंपनी जेपी को दिया गया था कंपनी ने गत मार्च माह में निर्माण कार्य भी आरंभ कर दिया था लेकिन एनएचएआई द्वारा जेपी कंपनी पर काम में देरी के कारण 12 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया था। कंपनी ने ब्रिज निर्माण की रकम से जुर्माने की रकम न काटने का आग्रह किया था लेकिन एनएचएआई ने कंपनी का प्रस्ताव ठुकरा दिया था तभी कंपनी ने फ्लाई ओवर ब्रिज का काम रोक दिया था।मरावती कॉलोनी में बारिश के पानी की वजह से हुए नुकसान की वजह से अमरावती रेजिडेंट्स वलफेयर एसोसिएशन के सदस्यों ने रोष जताया। उन्होंने सरकार और डीएलएफ कंपनी से पानी निकासी का प्रबंध करने की मांग की। 2 दिनों से हो रही मूसलाधार बारिश के कारण स्थानीय डीएलएफ कॉलोनी की सड़कों से बहता हुआ अमरावती कॉलोनी में प्रवेश कर गया। एसोसिएशन प्रधान शमशेर शर्मा, महासचिव कर्नल अवकाश राय ने बताया कि नदी की तरह अमराती में घुसे पानी के कारण कॉलोनी तालाब बन गई है। यही नहीं मंदिर के समीप कई घरों में पानी घुस गया है। डीएलएफ कॉलोनी से आए पानी और पत्थरों ने हाल ही में बनी अमरावती-भगवानपुर रोड भी तोड़ दिया है।
रायपुररानी के गांव खटौली में भारी बरसात के कारण उखड़ा पेड़।
मकानों पर गिरा पेड़, दीवारें टूटीं
रायपुररानी (निस) : खटौली गांव में भारी बरसात के चलते बड़ा हादसा टल गया। रात को बरसात के बाद चली तेज हवा के बाद घरों के बीच में खड़ा पीपल का पेड़ जड़ समेत उखड़ कर गिर गया। जिसके चलते आसपास के मकानों की दीवारें टूट गई और शैड भी टूट गया। लेकिन किसी को चोट नहीं आई। उधर गांव ककराली-खानपुर रोड़ पर लगे पुल के नीचे से पानी की निकासी न होने के कारण नदी में आये पानी ने चलते रूख मोड़ लिया और करीब 200 एकड़ धान की फसल डूब गई।

Tuesday, September 18, 2018

牛津大学发起“一带一路”环境数据平台

“ 一带一路”倡议不仅是中国提升国际事务影响力的核心手段之一,也是中国通过境外投资盘活大量外汇储备的一个重要途径。 “ 一带一路”相关项目的累计投资额预计在4万亿到8万亿美元之间。

如果“一带一路”倡议下的巨额资本投资与应对气候变化、确保可持续发展的目标不能很好的契合的话,那么《巴黎协定》和联合国“可持续发展目标”就不可能得到很好的落实。因此, 绿色“ 一带一路”倡议是一个具有全球意义的重要议题。

首先,推进绿色“ 一带一路”倡议的先决条件是要搞清目前现有和规划的“一带一路”项目会给当地和全球环境,以及可持续发展带来怎样的影响。其次,要从与环境变化、尤其是气候变化相关的不同自然风险和过渡风险的角度,搞清楚现有和规划的“一带一路”项目所面临的资产搁浅风险。

现阶段,无论是从单个项目,还是从所有项目整体的角度来说,我们都既不了解“一带一路”倡议能够在多大程度上契合不同的可持续性目标,也不了解它们的环境风险暴露程度。我们需要这些相关的数据和分析,来帮助政府、私营和公共金融机构、金融监管部门、企业和民间团体做出决策。这一点对整个社会体系来说非常重要。

披露“一带一路”项目给当地、乃至全球环境和可持续发展带来的影响有助于对项目是否应该上马进行甄别。通过公布企业和投资者参与”一带一路”项目所带来的积极或负面的影响,极有可能会促使这些企业转变行为,确保他们做出具有积极意义的选择。

公布“一带一路”项目的环境风险有助于合理定价资本成本,提高风险项目的启动或再融资难度,从而有助于规避资产搁浅风险。这不仅可以使中国的资产所有者受益,同时还能让包括“一带一路”沿线国家的金融机构、国际私人资本和多边金融机构等在内的其他参与投资的资本所有者获益。此外,它还可以改善单个金融机构的风险弹性,并且有助于尽可能地降低大量资产搁浅的风险给金融稳定带来的影响。

为了回应对数据和分析的这一明确的需求,牛津大学史密斯企业与环境学院的可持续金融项目发起了一项测量“一带一路”投资项目的资产搁浅风险和环境影响的国际合作项目。而这个项目的发布恰逢12月15日一年一度的中英经济财金对话召开。

这个全新的“ 绿色一带一路平台”所采用的方法经过牛津大学和多家大型金融机构的密集测试和改进。该项目的核心是一个新的在线数据和分析平台,这个平台将在2018年上半年上线。该平台可以帮助所有的金融机构兑现自己的承诺,将气候和可持续性评估纳入他们各个行业的决策之中。这些信息同样适用于决策部门、监管机构、企业和民间团体。

该项目将现有的与新建的资产数据结合起来的这功能可以帮助使用者了解“一带一路”项目潜在的环境风险和影响,金融机构、企业和决策者可以利用这些精确的信息来最大限度地降低风险、创造社会效益。

该项目在第一阶段重点关注“一带一路”沿线国家的以下六个行业:发电、水泥、钢铁、汽车、航空和船舶。假以时日它还将覆盖其他一些行业,包括:电网、公路、铁路、食品和饮料的生产与加工、纸张、冶炼、矿产、上游石油和天然气、管道和液化天然气(LNG) 基础设施等。

绿色“ 一带一路”要求我们必须了解现有和规划中的“一带一路”项目对环境的影响,以及项目面临的资产搁浅风险。绿色“ 一带一路”平台让这些信息首次成为公众可以获知的资源。

绿色“ 一带一路”能够帮助人类塑造一个更好的未来,而一个高污染的“一带一路”则会瓦解“让我们的星球再次伟大”这个目标。数据和分析是帮助“ 一带一路”项目创造积极环境成效的根本。幸运的是,国际合作、数据科学的发展、以及辛勤的工作让这一切成为可能。

渔业的“中国方案”对环境意味着什么?

月9日,中国农业部渔业渔政管理局副局长韩旭在北京表示,中国一方面需要发展渔业来改善人们食物的营养成分、解决食物供给问题,另一方面也需要管理和控制渔业、不让渔业破坏海洋生态——中国可以在这两方面为世界提供一个“中国方案”。

渔业过度捕捞已经成为全球最严峻的海洋问题之一。联合国粮农组织统计全球90%的鱼类资源已经遭到过度捕捞或充分捕捞,渔业资源的衰退将对数亿依赖海洋为生的人口的粮食和生计带来威胁。

作为海洋捕捞量占世界总量18%的全球最大渔业国家,中国也面临着严重的过度捕捞。中国农业部的数据显示, 年中国近海海洋捕捞总产量达1328万吨,远超过渔业专家建议的800-900万吨的最大可捕量。此次韩旭副局长提出的“中国方案”,正是为了应对和缓解持续数十年的过度捕捞,给中国近海海洋生物多样性和海洋生态系统提供喘息和恢复空间。这个方案提出了三个具体的目标:

一、到2020年,将中国的捕捞能力降低15%,其中渔船数量减少2万艘、渔船马力削减150万千瓦;

二、削减309万吨捕捞产量,将捕捞总量控制在1000万吨以下;

三、对非法、未报告、未受管制的捕捞行为(以下简称IUU捕捞)采取“零容忍”态度。

中国海洋机动捕捞船总量为18.7万艘,包括2600艘左右远洋捕捞船,减少2万艘渔船,意味着超过10%的近海渔船数量削减。而刚刚公布的《十三五全国远洋渔业发展规划》也为远洋渔船数量设了上限(到2020年不超过3000艘)。而“中国方案”中减少的309万吨捕捞产量,大约相当于日本全国一年的海洋捕捞产量。

这是中国渔业管理历史上针对海洋捕捞产量和渔船数量功率所提出的“最硬指标”,如果切实落到实处,产量的“负增长”除了有利于海洋生态之外,也能带来捕捞业经济效益的“正增长”。尽管中国海洋捕捞产量常年高居全球第一,捕捞总量也保持稳定,然而在“船多鱼少”的现状下,渔船的捕捞效率实际上非常低下,近海渔获物更是表现出明显的“低值化”倾向。

绿色和平2017年发布的《中国海洋幼杂鱼捕捞现状及对中国可持续渔业发展的启示》(以下简称《报告》)显示,保守估计,包括各种捕捞类型在内,中国近海渔获物中30%为体型过小、种类太杂而无法食用的“幼杂鱼”,每年的总重量接近400万吨,超过日本全国一年的海洋捕捞产量。

但如果降低捕捞能力、加强渔业管理,经济鱼类的幼鱼就有更大的概率能够长大、繁殖,不仅市场价值将增加数十甚至上百倍,也更有利于渔业资源状况的恢复。

中国近海资源的衰退在很大程度上催生了远洋渔业的快速扩张,因此,如果近海过度捕捞状况得到改善,也将有助于疏解远洋渔业产能过剩的问题。中国拥有全球最庞大的远洋船队,渔船数量约2600艘。然而,以阿根廷军警击沉中国渔船和“加拉帕戈斯鲨鱼案”为代表的一系列备受国际社会关注的事件说明,中国远洋渔业企业在“走出去”的过程中,无论是对入渔国当地法律法规的遵守的意愿还是能力都亟待提高,中国远洋渔业的发展模式也亟待改变。而对IUU捕捞的“零容忍”态度,显示了中国政府规范有序发展远洋渔业的意愿。

实际上,明确目标之后,更大的挑战将来自于政府部门能否辅之以更完善的政策法规、更严格的执法和监督,来保障目标的顺利实施。在这方面,中国的渔业管理部门已经开始了一系列行动,包括调整国内渔船的燃油补贴政策,开展限额捕捞试点工作等。不过,要彻底解决持续几十年的过度捕捞问题,实现渔业的健康持续发展,需要做的工作还有很多。

首先,渔业管理需建立在科学的基础之上,然而基础资料的缺乏一直是限制中国渔业管理发展的短板,因此,优化基础捕捞数据的统计和收集、加强渔业行业的可追溯性建设、增强信息的透明公开等工作需要持续加强;其次,水产养殖被视为缓解捕捞压力的解决方案,但中国水产养殖生产过程中需要消耗大量野生渔业资源,水产养殖行业的饲料需求进一步加剧了幼杂鱼的过度捕捞,因此,水产养殖行业的可持续转型也需同步进行;最后,应以法律法规的形式确立各项管理措施,将“突击行动”式执法活动逐步落实为常态化的监管模式,并逐步统一各地方渔业管理的措施和力度,避免地区间的差异为违法行为制造可乘之机。

Tuesday, September 11, 2018

विवेकानंद ने शिकागो के भाषण में क्या कहा था?

जनवरी, 1863 को कोलकाता में जन्में नरेंद्र नाथ आगे चलकर स्वामी विवेकानंद के नाम से मशहूर हुए. विवेकानंद की जब भी बात होती है तो अमरीका के शिकागो की धर्म संसद में साल 1893 में दिए गए भाषण की चर्चा ज़रूर होती है.
ये वो भाषण है जिसने पूरी दुनिया के सामने भारत को एक मजबूत छवि के साथ पेश किया. लेकिन भाषण में उन्होंने कहा क्या यह कम ही लोग बता पाते हैं. ये हैं स्वामी विवेकानंद के उस भाषण की खास बातें:
1. अमरीकी भाइयों और बहनों, आपने जिस स्नेह के साथ मेरा स्वागत किया है उससे मेरा दिल भर आया है. मैं दुनिया की सबसे पुरानी संत परंपरा और सभी धर्मों की जननी की तरफ़ से धन्यवाद देता हूं. सभी जातियों और संप्रदायों के लाखों-करोड़ों हिंदुओं की तरफ़ से आपका आभार व्यक्त करता हूं.
2. मैं इस मंच पर बोलने वाले कुछ वक्ताओं का भी धन्यवाद करना चाहता हूं जिन्होंने यह ज़ाहिर किया कि दुनिया में सहिष्णुता का विचार पूरब के देशों से फैला है. मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से हूं जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है. हम सिर्फ़ सार्वभौमिक सहिष्णुता पर ही विश्वास नहीं करते बल्कि, हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्वीकार करते हैं.
4. मुझे गर्व है कि मैं उस देश से हूं जिसने सभी धर्मों और सभी देशों के सताए गए लोगों को अपने यहां शरण दी. मुझे गर्व है कि हमने अपने दिल में इसराइल की वो पवित्र यादें संजो रखी हैं जिनमें उनके धर्मस्थलों को रोमन हमलावरों ने तहस-नहस कर दिया था और फिर उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली.मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं जिसने पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और लगातार अब भी उनकी मदद कर रहा है.
6. मैं इस मौके पर वह श्लोक सुनाना चाहता हूं जो मैंने बचपन से याद किया और जिसे रोज़ करोड़ों लोग दोहराते हैं. ''जिस तरह अलग-अलग जगहों से निकली नदियां, अलग-अलग रास्तों से होकर आखिरकार समुद्र में मिल जाती हैं, ठीक उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा से अलग-अलग रास्ते चुनता है. ये रास्ते देखने में भले ही अलग-अलग लगते हैं, लेकिन ये सब ईश्वर तक ही जाते हैं.
7. मौजूदा सम्मेलन जो कि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से है, वह अपने आप में गीता में कहे गए इस उपदेश इसका प्रमाण है: ''जो भी मुझ तक आता है, चाहे कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं. लोग अलग-अलग रास्ते चुनते हैं, परेशानियां झेलते हैं, लेकिन आखिर में मुझ तक पहुंचते हैं.''सांप्रदायिकता, कट्टरता और इसके भयानक वंशजों के धार्मिक हठ ने लंबे समय से इस खूबसूरत धरती को जकड़ रखा है. उन्होंने इस धरती को हिंसा से भर दिया है और कितनी ही बार यह धरती खून से लाल हो चुकी है. न जाने कितनी सभ्याताएं तबाह हुईं और कितने देश मिटा दिए गए.
9. यदि ये ख़ौफ़नाक राक्षस नहीं होते तो मानव समाज कहीं ज़्यादा बेहतर होता, जितना कि अभी है. लेकिन उनका वक़्त अब पूरा हो चुका है. मुझे उम्मीद है कि इस सम्मेलन का बिगुल सभी तरह की कट्टरता, हठधर्मिता और दुखों का विनाश करने वाला होगा. चाहे वह तलवार से हो या फिर कलम से.
अमरीका ने बताया है कि उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को अपने ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन के बाद फॉलो-अप मीटिंग के लिए ख़त लिखा है.
अमेरिका का कहना है कि वो पहले से ही एक नई मीटिंग तय करने पर विचार कर रहा है.
व्हाइट हाउस की प्रवक्ता सारा सैंडर्स का कहना है कि उत्तर कोरिया की तरफ़ से ये ख़त दिखाता है कि वो परमाणु मुक्त होने को लेकर प्रतिबद्ध है.
जून में सिंगापुर में दोनों नेताओं के ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन के बाद इस विषय पर बातचीत रुक गई थी.
सैंडर्स ने कहा, "पत्र का प्राथमिक उद्देश्य अनुरोध करना था और राष्ट्रपति के साथ एक और बैठक निर्धारित करना था, जिसके लिए हम तैयार हैं और पहले ही इसे तय करने की प्रक्रिया में हैं."
उन्होंने कोई संकेत नहीं दिया कि दोनों नेताओं के बीच दूसरी संभावित बैठक कब हो सकती है.
दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जेई-इन ने इस ख़बर का स्वागत करते हुए कहा कि "कोरियाई प्रायद्वीप का पूरी तरह से परमाणु मुक्त होना एक ऐसा मुद्दा है जिसे अमेरिका और उत्तरी कोरिया के बीच बातचीत के माध्यम से ही हल किया जाना चाहिए."
जून में सिंगापुर शिखर सम्मेलन में मून जेई-इन की मध्यस्थता काफ़ी महत्वपूर्ण थी और वे खुद भी अगले हफ्ते प्योंगयांग में किम जोंग-उन से तीसरी बार आमने-सामने मिलने वाले हैं.
सियोल से बीबीसी संवाददाता लौरा बिकर का कहना है कि मून जे-इन दोनों पक्षों के बीच खुद को मध्यस्थ के रूप में देखते है और उन्होंने दोनों से साहसिक कदम उठाने की बात कही है.
उत्तर कोरिया का ये पत्र ऐसे समय आया है जब संयुक्त राष्ट्र के परमाणु निगरानी के प्रमुख युकिया अमानो ने चेतावनी दी है कि उत्तर कोरिया की मौजूदा परमाणु गतिविधियां संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के नियमों का उल्लंघन हैं.
अंतरराष्ट्रीय निरीक्षक उत्तर कोरिया में प्रतिबंधित हैं, लेकिन अमानो ने कहा कि अगर कोई राजनीतिक समझौता होता है तो वे वापस लौटने के लिए तैयार हैं.
सैंडर्स ने पिछले हफ़्ते हुई उत्तर कोरिया की सैन्य परेड की भी प्रशंसा की और कहा कि "यह पहली बार था जब ये परेड उनके परमाणु हथियारों को लेकर नहीं थी. सैंडर्स ने इसका श्रेय ट्रंप की सफ़ल नीतियों को दिया.
खबरों के मुताबिक़ उत्तरी कोरिया ने अपनी 70वीं वर्षगांठ परेड में अपने सैनिक, टैंक और अन्य हथियार तो दिखाए, लेकिन किसी भी अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों (आईसीबीएम) का प्रदर्शन नहीं किया था.
आईसीबीएम, जो अमेरिका को टारगेट करने में सक्षम है और संभावित तौर पर इसमें परमाणु हथियार भी लैस किए जा सकते हैं, इसका प्रदर्शन करना उकसावे के रूप में देखा जाता.
ट्रंप ने ट्विटर के माध्यम से उत्तर कोरिया के नेता का शुक्रिया अदा किया और कहा कि ये परेड "उत्तरी कोरिया का एक बड़ा और बहुत सकारात्मक क़दम" थी.
"चेयरमैन किम को धन्यवाद. हम दोनों सभी को गलत साबित करेंगे!"

Wednesday, August 29, 2018

美中气候项目提升全球协议野心

自从中美两国在北京 会议期间发布了《中美气候变化联合声明》后,有关双方的承诺将如何影响全球气候谈判及人类最终能否免遭气候变化危害等问题就成了人们持续关注的焦点。

美国承诺到2025年将在 年排放的基础上实现26%—28%的减排目标;中国承诺在2030年左右达到二氧化碳排放峰值,并计划到2030年将非化石能源占一次能源消费比重提高到20%左右。尽管中国目前还未提出绝对排放上限,但要求将这一目标纳入下一个五年计划的呼声愈演俞烈。

然而《中美气候变化联合声明》中宣布的中美合作新举措尚并未引起人们足够的重视。这些措施包括:(1)扩大中美清洁能源研究中心的研发工作;(2)由中美两国共同在中国开展新的碳捕集项目;(3)就消减氢氟碳化物的使用“加强”双边合作。联合国环境规划署( )曾发出警告:氢氟碳化物可能会对气候变化造成严重影响;(4)启动城市气候论坛;(5)设立一个以低碳发展为主题的访华贸易代表团。

若以上措施均得到落实,将大大丰富中美之间,以及欧盟等其他主要碳排放国之间现有的气候变化合作项目。这些合作项目多在国家、省、市一级以及私营部门展开,并不属于以联合国气候变化框架会议( )为核心的全球气候制度的范畴。尽管如此,双边合作依然有助于在能力所及的范围内推动开展更富有雄心的全球合作。

承诺与评议

在最近一次的气候峰会上,各国外交人士齐聚利马,力争在2015年12月之前达成一项不同于以往的,有别于《京都议定书》这种自上而下、集中形式的协议,因为2009年举行的哥本哈根会议证明这样的协议是无法达成的。此后,各国谈判代表采用“承诺与评议”模式,由各国提出自己的减排承诺并交由国际社会评议。与此同时,各国继续围绕给予发展中国家财政和技术援助以帮助其应对气候变化等一系列有关机构和资金的问题展开谈判。

由此看来,双边合作是一种顺应气候外交趋势的做法,而不是与其背道而驰。在多边谈判过程中,中国仍然坚持联合国气候公约中的“共同而有区别的责任”原则,该原则主张发达国家应承担更多的减排责任(欲了解目前为解决这一症结所做的各种努力请参见此处)。中国国家主席习近平的目标是,到2049年中国将跻身发达国家的行列。也就是说,与美国相比,中国还将在未来很长一段时间里坚持在联合国气候变化框架公约( )下承担较低的减排承诺。

在与美国及其他国家合作过程中,中国愈来愈多地扮演着清洁技术和资金输出国的角色。而这一角色与其在联合国气候谈判中强烈主张共同而有区别的责任的立场产生了激烈的冲突。例如,在10月份的联合国气候变化框架公约会议期间,中方谈判代表声明联合国气候协议不应包括“南南合作”(中国是南南合作的主要倡议国)。

然而,双边合作也就意味着中国把气候变化看成是与美国开展进一步合作的机会。隶属于中国国家发改委的国家应对气候变化战略研究和国际合作中心( )对《中美气候变化联合声明》表示欢迎,称其“开辟了广阔的合作前景和领域”。该中心的评估报告也预示着中美将开展新一轮合作。例如,该评估报告提出中国希望借中美气候领域的合作契机,利用外汇储备投资美国的清洁能源领域和基础设施建设,以减少两国之间贸易的“不平衡”。

国家应对气候变化战略研究和国际合作中心主任李俊峰在11月份举行的中澳青年对话中强调,中美双方在气候领域存在的争论不同于其他领域。在气候领域方面,中美双方完全可以合作,共谋利益,为中美两国打下更多合作基础,这有助于双方提高能力,采取更富有雄心的措施。

“升级换代”

经过数年的准备,各国终于要在2015年确定全球环境目标。联合国将于七月在亚的斯亚贝巴召开发展筹资问题的国际会议,其目的是为2015年后国际发展议程建立融资框架。接下来将于九月在纽约举行联合国大会,届时各国将签署可持续发展目标,以代替即将到期的千年发展目标。最后将于12月举行的巴黎峰会上达成气候协议,该协议计划于2020年生效。

即使上述峰会达成的目标全部得以落实,也未必会让全世界走上一条可持续发展的道路。这也就意味着,那些希望进一步取得进展的政府和利益相关方还需要为制定更加雄心勃勃的目标创造条件(美国认为,应在巴黎协议的基础上以五年为周期对计划进行调整,而其他国家则倾向以十年为周期)。双边及私营领域的项目合作由于受到不同的外交政策和商业利益驱动,因而无法取代一份有力的国际协议。但尽管如此,这些合作项目能够帮助落实“新的气候经济”,并有助于加快多边外交进程的发展。